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Samvet is a referred research journal publishing from India and specially meant for the person working in Hindi Literature. It is theme based and published twice in a year in print mode.

ISSN Print:   2321-6131

Website: http://www.inscribepublications.com/journal/samvet

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  • Author: Neetu Parihar

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 74-78, DOI:

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    आज हर ओर बदलाव की बयार है पूरी दुनिया में भाग-दौड़ मची है जिन्दगी को बेहतर, और बेहतर तरह से जीने की। उपभोक्तावादी संस्कृति में सभी आगे निकलने की होड़ में है। इस चूहा-बिल्ली दौड़ का कोई ओर-छोर नजर नहीं आता, फिर भी सब भाग रहे हैं। आधुनिक से और आगे उत्तर आधुनिक युग में लोगों के पास समय ही नहीं है अपने लिए, ऐसे में वे किसी ओर के बारे में कब और क्या सोचेंगे। आजकल स्त्री और पुरुष दोनों ही कंधे से कंधा मिला कर घर की गाड़ी को खींच रहे हैं वहाँ उन्हें पास-पड़ौस की भी खबर हो इसमें संशय है। इन सब विपरीत परिस्थितियों में भी अगर कुछ सकारात्मक चीजें दिखाई दे तो निसंदेह वे सूकून देती हैं। यह सकारात्मकता हम आज की कविता और कवि में देख सकते हैं। ‘‘आज की कविता में जीवन-राग पहली महत्त्वपूर्ण पहचान है।” लाख बदलाव आया हो पर कुछ रिश्ते, कुछ मूल्य, कुछ संस्कृति अब भी बची है। यही रिश्ते आज कविता के विषय भी बने हैं। आज का कवि रिश्तों की अहमियत को पहचानता है । यही कारण है कि रिश्ते जीवन में जगह बनाने के साथ-साथ कविता में भी अपनी जगह बनाते हैं। कवि अरविंद की कविता ‘‘माँ! तुम कब आओगी” बड़ी मर्मस्पर्शी है जिसमें वे माँ के साथ बीते पलों को याद करते हैं-
  • Author: Anil Kumar Jain

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 38-42, DOI:

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    वर्तमान युग विद्यार्थियों को सूचनाओं से तो ओत-प्रोत कर रहा है वह इन्हीं सूचनाओं को पाने की होड़ में लगा हुआ है और अध्यापक कक्षा कक्ष में उसे ज्यादा से ज्यादा सूचनाएँ देने की होड़ में लगे हुए हैं ऐसी स्थिति में अध्यापक सूचना प्रदाता हो गया है और विद्यार्थी मात्र सूचना ग्राही। सूचनाओं की यह होड़ विद्यार्थी को मशीन की तरह बनाती जा रही है जहाँ इन सूचनाओं के संग्रहण का स्थान है लेकिन इनके आत्मसातीकरण का स्थान नहीं है इनका विश्लेषण, चिन्तन, मनन, विस्तारण का स्थान नहीं है। इसी होड़ में होशियार विद्यार्थी आगे से आगे सूचनाएँ ग्रहण करता जा रहा है लेकिन औसत और कमजोर विद्यार्थी पिछड़ता चला जा रहा है। क्या औसत एवं कमजोर विद्यार्थी अपने बुद्धि में विश्लेषणात्मक क्षमता नहीं रखता? क्या वह चर्चा परिचर्चा की क्षमता नहीं रखता? क्या उसकी बुद्धि में विस्तारण क्षमता नहीं है। प्रसिद्ध दार्शनिक रॉस कहते हैं कि बुद्धि जन्मजात होती है यदि ऐसा है तो उसकी बुद्धि में यह सब क्षमताएँ हैं। सवाल है उसकी बुद्धि को यह अवसर प्रदान करने की हमारी तथाकथित एक तरफा व्याख्यान प्रणाली विद्यार्थी को यह अवसर प्रदान नहीं कर पाती है। अतः सहकारी अधिगम एक ऐसी विचारधारा है जो इन सब बुद्धिलब्धि वाले विद्यार्थियों को एक साथ बैठकर सहयोगी भाव से सीखने के अवसर प्रदान करती है।
  • Author: Hariram Meena

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 1-7, DOI:

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    देश के जो प्राकृतिक संसाधन बचे हुए हैं, हजारों वर्षों से आदिवासी लोग उनके संरक्षक रहे हैं और आज भूमंडलीकरण का वह दौर चल रहा है जब सारे प्राकृतिक संसाधनों का फटाफट और अंधाधुंध दोहन कर लिया जाए, हो सकता है फिर ऐसा सुनहरा अवसर इन कंपनियों को मिले या ना मिले। संभव है कि वैश्वीकरण का जो अमानवीय चेहरा सामने आ रहा है वो और स्पष्ट न हो जाए जो जगह-जगह आमजन को व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा कर दे। यदि ऐसा हुआ तो संभव है कि सन् 1989 में जो नई आर्थिक नीति देश में शुरू की गई थी जिसकी चरम परिणति जनविरोधी वैश्वीकरण के रूप में अब सामने आ रही है, उसमें जन पक्षधर संशोधन करने को सरकारें विवश न हो जाएं। यह सब कुछ भांपते हुए (और यह आप और हम भली भांति जानते हैं कि चालाक लोग वक्त से पहले आगत के संकेतों को समझ लेने की क्षमता रखते आए हैं) बहुराष्ट्रीय निगमों, उनको मॉडल मानने वाले देशी पूंजीपतियों और प्राकृतिक संसाधनों की बंदरबांट में लगे राजनेता, प्रशासकों व बिचौलियों को यह सूट करता है कि जो लोग प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के खिलाफ आवाज उठाते हैं उन्हें ठिकाने लगाया जाए और अपना रास्ता साफ किया जाए। यह सारा झंझट जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ने वाले राष्ट्रभक्तों बनाम देशी-विदेशी लुटेरे पूंजीपतियों के बीच का है। लोकतंत्र में राजनीति की अहम भूमिका होती है इसलिए पूंजी-नायक राज-नेताओं के माध्यम से बड़े फैसले करवाते हैं। गत 6 मई, 2013 को सूचना प्रौद्योगिकी समिति ने पेड न्यूज से सम्बन्धित मुद्दे पर अपनी 47वीं रिपोर्ट संसद में पेश की। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘यह तथ्य परेशान करने वाला है कि पेड न्यूज व्यक्तिगत पत्रकारों के भ्रष्टाचार तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि इसने मीडिया कम्पनी के मालिकों, प्रबंधकों, निगमों, जनसम्पर्क कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों राजनीति से जुड़े हुए कुछ वर्गों को भी अपने चंगुल में ले लिया है। परिणामस्वरूप विज्ञापन, समाचार तथा सम्पादकीय को एक दूसरे में इस तरह घुला मिला दिया है कि इन्हें अलग अलग करना मुश्किल होता जा रहा है।
  • Author: Preeti Bhatt

    Volume: 2

    Year: 2014

    Pages: 62-68, DOI:

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    समकालीन हिन्दी कविता का फलक बहुत विस्तृत है। इसके विषय क्षेत्र में आज के जीवन के हर पहलू तथा समूचा पर्यावरण है। हमारे चारों ओर की प्रकृति, प्रकृति में होने वाले परिवर्तन, प्राकृतिक असंतुलन, वैश्वीकरण के चलते पर्यावरण पर बढ़ने वाले दबाव आदि सभी पक्ष इसमें जगह पाते हैं। आज की हिन्दी कविता में इन सभी परिदृश्यों पर सजगता और चिन्ता है या यों कहें कि इसमें प्रकृति का स्पन्दन बड़ी शिद्दत से सुनाई देता है।
  • Author: Shreeniwas Tyagi

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 112-117, DOI:

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    हिन्दी-साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु-काल (1857 से 1900) हमें कई दृष्टियों से बहुत ही महत्त्वपूर्ण साहित्य प्रदान कर गया है। इस काल से ही हिन्दी साहित्य में नवजागरण और नव-चेतना का उदय हुआ। हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्र में राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना का भी साहित्य के माध्यम से प्रचार-प्रसार शुरु हुआ। इस काल के लेखकों और रचनाकारों ने पूर्व से चली आ रही रूढि़वादी परम्पराओं और मान्यताओं को तोड़कर साहित्य को जीवन के विविध क्षेत्रों से जोड़ा। इस सन्दर्भ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने सही लिखा है कि – भारतेन्दु का पूर्ववर्ती काव्य-साहित्य संतों की कुटिया से निकलकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुँच गया था, उन्होंने (भारतेन्दुयुगीन साहित्यकारों ने) एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी तरफ उसे दरबारीपन से निकाल कर लोकजीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया। इस प्रक्रिया में साहित्य की नई-नई गद्य विधाओं का हिंदी साहित्य में उद्भव और विकास हुआ और गद्य विधाओं में खड़ी बोली का प्रयोग होने लगा। लेकिन भारतेन्दुयुगीन लेखकों के अपने हिंदी-प्रेम एवं धार्मिक भावनाओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति के कारण इस युग के साहित्य को बहुधा जान-बूझ कर सांप्रदायिक कह दिया जाता है।
  • Author: Prabhu Lal Verma

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 93-97, DOI:

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    हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का सार एवं प्रकाश हो जो हम में गति, संघर्ष, और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है। प्रेमचंद ने उक्त विचार ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के प्रथम अधिवेशन में व्यक्त किए थे।
  • Author: Deependra Singh Jadeja

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 99-107, DOI:

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    मध्यकालीन गुजरात में हिन्दू धर्म के विविध सम्प्रदाय प्रचलित थे। इनमें वैष्णव, शैव, शाक्त, स्वामी, नारायण, जैन धर्म आदि प्रमुख थे। ये सम्प्रदाय कुछ खास वर्गों के लोगों का प्रतिनिधित्व करते थे। वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायियों में मुख्यतया अहीर जाति के राजा, जमींदार, वैश्य और कारीगर वर्ग के लोग सम्मिलित थे। जनसाधारण में सिद्धों, योगियों और सन्यासियों का प्रभाव अधिक था। जबकि अधिकांश राजपूत राजा शैव या शाक्त धर्म के अनुयायी थे। इन सम्प्रदायों और इनके अनुयायियों द्वारा विविध देवी-देवताओं की पूजा-उपासना की जाती थी। गुजरात के हिन्दी का प्रसिद्ध महाकाव्य ‘प्रवीणसागर’में शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के साथ-साथ शिव के एकाधिक स्वरूपों की वंदना कवि ने की है। अन्य वर्णनों में गणेश-स्तुति, शारदा-स्तुति, भवानी स्तुति के उल्लेख मिलते हैं-
  • Author: Sunil Kulkarni; Pardesi Komalkumar

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 108-111, DOI:

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    रामचरितमानस भक्ति के क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता हैं। सांप्रदायिक सद्भाव के संबंध में तुलसी के रामचरितमानस में जो विचार अभिव्यक्त हुए हैं वे समूचे विश्व के मार्गदर्शक हो सकते हैं। तुलसी का रामचरितमानस समन्वय की विराट साहित्यिक रचना है। इसमें हर समय नित नए तथ्य सामने आते हैं। सांप्रदायिक सद्भाव के संदर्भ में तुलसीदास की भूमिका महत्त्वपूर्ण हैं। सांप्रदायिक सद्भाव वर्तमान युग की परम आवश्यकता बन चुकी हैं। आज विश्व में कई समस्याएँ उभरकर आ रहीं हैं। कहीं जाति के नाम पर दंगे फसाद, तो कहीं आंतकवाद जैसी घटनाएँ घटित हो रही हैं। इन सभी के मूल में प्रमुख कारण है सांप्रदायिक सद्भाव का अभाव। आज लोगों को सच्चे अर्थ में उन सभी मूल्यों को फिर से जागृत करने की जरुरत आन पड़ी हैं जो तुलसी ने उस काल में जगाए थे।
  • Author: Kunjan Acharya

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 20-23, DOI:

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    हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रयासों से कहीं बेहतर मीडिया की कोशिशों ने हिन्दी को ज्यादा लोकप्रिय बनाया है। सरकार बरसों से हिन्दी सप्ताह मना कर या पखवाड़े मना कर इस दिशा में अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है लेकिन आम जनता में इसको कैसे लोकप्रिय और कामकाजी बनाए इसके लिए जमीनी स्तर के प्रयास आज तक नहीं हुए। जनसंचार के माध्यमों का पिछले एक दशक में जितना विस्तार हुआ है उतना पहले कभी नहीं हुआ। इसका सबसे अहम कारण तकनीकी क्रान्ति और डिजिटल विकास है जिसने सब कुछ आसान कर दिया। इस डिजिटल दौर में हिन्दी ने अपना एक नया मुकाम बना लिया है और यह सब कुछ सम्भव हुआ है संचार के नवीन माध्यमों के प्रभाव के कारण।
  • Author: Vijaykumaran C.P.V.

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 12-19, DOI:

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    तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन में परंपरागत दृष्टिकोण से दो भाषाओं में लिऽे गए साहित्य के कथ्यपरक तुलनात्मक अध्ययन को प्रवृत्त किया गया है। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में दूसरे दृष्टिकोण के तहत एक ही भाषा के साहित्य में सांस्कृतिक अंतर को केन्द्र में रऽकर साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन किया जा रहा है । दलित विमर्श, नारी विमर्श अथवा आदिवासी विमर्श की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि मुख्य धारा के साहित्य से भिन्न है। इस परिधि पर स्थित विमर्श के परिप्रेक्ष्य में मुख्यधारा अर्थात केन्द्रवर्ती साहित्य को देऽना भी तुलनात्मक साहित्य के अन्तर्गत समाविष्ट हो जाता है । बहरहाल, सामाजिक न्याय की ऽोज से प्रेरित नारीवादी जांच, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक तथ्य के व्यापक परिप्रेक्ष्य को निर्माती है। शरीर, वर्ग और मजदूरी, विकलांगता, परिवार, वैश्वीकरण, मानव अधिकार, लोकप्रिय संस्कृति, जाति और नस्लवाद, प्रजनन, विज्ञान, यौन कार्य, मानव तस्करी और कामुकता आदि नारीवादी विमर्श में शामिल हैं। तुलनात्मक साहित्य की इस नई दिशा के अंतर्गत नारीवादी चिंतन के परिप्रेक्ष्य में सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ को देखने का प्रयास किया जा रहा है।
  • Author: Aruna Gurjar

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 43-52, DOI:

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    लोक शब्द अपने आप में विस्तृत क्षेत्र को समाविष्ट किए हुए है। लोक संसार रूपी घने वृक्ष में साहित्य, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता समाहित है और उसकी छाया में सम्पूर्ण जनमानस आह्लादित है। लोक साहित्य किसी भी राष्ट्र की और सार्वभौम मानव संस्कृति की कलातीत धरोहर है। इसका क्षेत्र असीम व व्यापक है। लोक शब्द सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक पृष्ठभूमि से सराबोर है। यह जीवन के विविध रंगों, हास-विलास को लेकर लवण की तरह घुला मिला है। यह आदिम मनुष्य से लेकर वर्तमान मनुष्य के जीवन मानस की सच्ची अभिव्यत्तिफ़ है। जब हम लोक शब्द का अर्थ ज्ञात करते है तो दो अर्थ निकलकर सामने आते हैं। संकुचित अर्थ जिसमें लोक का अर्थ है- जन, समाज, समूह, विश्व इत्यादि तथा व्यापक अर्थ में लोक इहलोक व परलोक से भी बढ़कर है। नानूराम संस्कर्ता ने लोक शब्द का अर्थ देते हुए कहा है कि लोक ‘लोक’ का हृदय है। लोक का अंग्रेजी प्रतिशब्द ’फोक’ है। इसी प्रकार वेदों, उपनिषदों में भी लोक शब्द को परिभाषित किया है। श्रीमद्भागवत में लोक व लोक संग्रह शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों पर किया गया है- कर्मणैवेहंससिद्धि पास्थिता तनकादय। लोकसंग्रहमेवपि संपश्यनन्कर्तुमर्हसि।।
  • Author: Sanjay Shrivastava

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 32-37, DOI:

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    काव्यभाषा को लेकर कविता के ऐतिहासिक विकास क्रम में तरह-तरह के प्रतिमान बनते रहे हैं लेकिन साठोत्तरी कविता में पहली बार समकालीन यथार्थ को समकालीन भाषा में प्रस्तुत किया गया। डॉ- रामविलास शर्मा के अनुसार भाषा को बनाने में, बदलने में और विकसित करने में युग की विचारधारा भावचेतना और संवेदना की सक्रिय भूमिका होती है। साठोत्तर कविता में काव्यभाषा में जो बदलाव आया उसे विकास नहीं बल्कि क्रांति कहना चाहिए। साठोत्तर युग में देशी परिवेश तथा विदेशी प्रेरणा से तरह-तरह के कविता आंदोलन पैदा होकर भाषा और साहित्य में तोड़-फोड़ के द्वारा अपनी नाराजगी और विरोध के तेवर दिखने लगे। ‘भाषा में आदमी होने की तमीज है’इसे धूमिल ने कभी नजरअंदाज नहीं किया। धूमिल काव्यभाषा को भी ‘संसद से सड़क’तक ले आए। धूमिल ने कहा है – शब्द किस तरह/कविता बनते हैं/इसे देखो/अक्षरों के बीच गिरे हुए आदमी को पढ़ो।
  • Author: Narendra Mishra

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 24-31, DOI:

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    प्रसिद्ध इतिहासवक्ता कर्नल टॉड का कथन है- ‘‘यह एक सार्वभौम सत्य है कि किसी देश के विकास के ज्ञान का सर्वाधिक उज्ज्वल प्रमाण वहाँ की नारियों की स्थिति है, क्योंकि वे न केवल संपूर्ण जनता की अर्द्धांश हैं अपितु अर्द्धांश (पुरुष वर्ग) को भी बहुत सीमा तक प्रभावित करती रहती हैं।’’ अपराजेय योद्धा है नारी। सृष्टि के प्रारंभ से ही सीता, अहल्या, द्रोपदी, यशोधरा, मीरा, महादेवी, ध्रुवस्वामिनी, मधूलिका को स्थापित करने की महायात्र अभी भी जारी है। पूर्व हो या पश्चिम उत्तर हो या दक्षिण सर्वत्र यही स्थिति है। सदियों से हो रहे अनाचार, अत्याचार और शोषण एवं दमन के विरुद्ध स्त्री चेतना ने ही स्त्री विमर्श को जन्म दिया है। स्त्री विमर्श आत्मचेतना, आत्मसम्मान, आत्मगौरव समानाधिकार की पहल का दूसरा नाम है।
  • Author: Shiv Prasad Shukla

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 79-85, DOI:

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    हिन्दी साहित्य में अलग-अलग संकायों के लोगों ने लिखना प्रारम्भ किया। इससे हिन्दी साहित्य की विधाओं का कैनवास काफी बढ़ा है। आधुनिक काल में कविता आंदोलनों की बाढ़ आ गयी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय 16 जनवरी, 1939 ई- में नरेश सक्सेना का जन्म ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ। उनके अध्ययन एवं अजीविका के विषय आभियांत्रिकी एवं तकनीकी रहे। लेकिन जबलपुर में इंजीनियर की पढ़ाई करते समय हरिशंकर परसाई, ज्ञानरंजन के माध्यम से हिन्दी साहित्य के रचनाकारों एवं आलोचकों से परिचय के कारण उनकी कविता उत्तरोत्तर वैज्ञानिक, तकनीकी एवं अभियांत्रिकी स्तर पर परिमार्जित होने लगी। उन्होंने टेलीविजन एवं रंगमंच के लिए ‘हर क्षण विदा है, ‘दसवीं दौड़’ का लेखन किया। विनोद भारद्वाज के साथ कविता एवं कला की पत्रिका ‘आरम्भ’ का सम्पादन किया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस रचनाकार के ‘समुद्र पर हो रही है बारिश’(2000 ई-), एवं ‘सुनों चारूशीला’(2012 ई-) काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं। यानी द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर 2012 ई- तक के अनुभवों का ताना-बाना दोनों काव्य संग्रहों की काव्यभाषा में देखा जा सकता है। अभियांत्रिकी एवं तकनीकी से जुड़े होने के कारण कवि स्वर एवं व्यंजन की अन्विति इस तरह से करते हैं कि सहृदय को बिल्कुल नयी काव्य भाषा का एहसास होता है।
  • Author: Meeta Sharma

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 86-92, DOI:

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    संस्कृति एक सतत् अटूट एवं निरन्तर प्रक्रिया है। यह प्रकृति की भाँति सचेतन, परिवर्तन व निरन्तरता लिए हुए हैं। काल के किसी भी क्षण में, जीवन में किसी भी मोड़, उम्र के किसी भी पड़ाव या अवस्था में व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता है कि वह स्वतंत्र हो गया है और उसे अब और सीखने करने की जरूरत नहीं है। परन्तु पूर्वाग्रह और कुंठाएं कुछ ऐसी ही प्रतिक्रियाएं हैं जो व्यक्ति को सांस्कृतिक ठहराव या अपूर्णता की और ले जाती है। सांस्कृतिक विकास की हमारी इस प्रक्रिया में साहित्य का सर्वाधिक योग रहता है। साहित्य का सम्बन्ध चूंकि हमारे भाव जगत संस्कारों और हमारी चेतना सत्ता से होता है। अतः संस्कृति से उसका अटूट रिश्ता है।
  • Author: Rajesh Lal Mehra

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 69-73, DOI:

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    लोक सामान्य से असामान्य का अधिष्ठान करता है। लौकिक को अलौकिक बनाता है। किन्तु अलौकिक को लौकिक बिंबों से ही पहचाना जा सकता है। लोक बिंब के सीमित या एकाकी अर्थ न ग्रहण कर पदार्थ या वस्तु के प्रति एक व्यापक अर्थ का बोध कराते हैं, जो सम्पूर्ण लोक में उसी रूप में पहचाना जाता है। यह भी कहा जा सकता है कि मनुष्य की व्यक्तिगत कल्पना समष्टिगत आस्था का स्वरूप धारण कर लेती है। हिन्दी कविता में छायावादी कविताएँ इस बिंब विधान की दृष्टि से भी अलग पहचानी जाती हैं, परन्तु वह बिंब रचनाकार की कल्पना या पीड़ा से जुड़ा होता है। लोक साहित्य में उस बिंब का लोक व्यापीकरण हो जाता है। लोक साहित्य की सामान्य चेष्टा भाव के प्रकाशन में होती है इसीलिए अनेक बिंब लोकोन्मुख होकर एक विशेष पहचान रखते हैं। बिटिया के हाथ पीले हुए का अर्थ सम्पूर्ण लोक में ‘विवाह होना’ही लगाया जाता है। लोक संस्कृति को समृद्ध बनाने में लोक बिंबों का विशेष योगदान होता है। काव्य-शास्त्र के विधानों ने बिंब का स्वरूप स्पष्ट करते हुए बताया है - बिंब किसी अप्रस्तुत वस्तु का मानसिक एवं काल्पनिक रूप है। काव्य सदैव अप्रस्तुत वस्तुओं का कल्पनागत वर्णन करता है। अतः काव्य के अंतर्गत रूप-दृष्टि इसी बिंब योजना की क्रिया है। हम कह सकते हैं कि वस्तु भाव या विचार को कल्पना एवं मानसिक क्रिया के माध्यम से इन्द्रियगम्य बनाने वाला व्यापार ही बिंब विधान है।
  • Author: Anju Thappa

    Volume: 2 (1)

    Year: 2014

    Pages: 1-11, DOI:

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    कोई भी रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से ही लोकप्रिय होता है। वह संघर्ष के पथ पर बढ़ता हुआ यातनाओं को झेलता, सृजन के माध्यम से ही शिखर पर पहुँचता है। उपन्यास लेखन जैसी विधा कठिन श्रम, धैर्य और भाषा पर अद्भुत पकड़ के बिना सधती नहीं है। नियमित लेखन की दिशा में गम्भीरता से अग्रसर पद्मा सचदेव ने भाषा के स्रोत में अपने भीतर को उलीच, डोगरी एवं हिन्दी साहित्य को बखूबी समृद्ध किया। पद्मा सचदेव ने डोगरी साहित्य में ही नहीं अपितु हिन्दी साहित्य में भी अपनी एक पहचान बनाई है।
  • Author: Ganga Sahay Meena

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 8-13, DOI:

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    पिछले कुछ वर्षों में आदिवासी समाज और साहित्य पर अकादमिक शोधों और संगोष्ठियों की बाढ़ सी आ गई है- बड़ी संख्या में रचनाकार आदिवासी जीवन से जुड़ा साहित्य (मुख्यतः कथा-साहित्य) रच रहे हैं। पत्रिकाएं आदिवासी विशेषांक निकाल रही हैं। आदिवासी विषयक संपादित पुस्तकों की भी संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। पूरे परिदृश्य को देखकर किसी को भी लग सकता है कि अब आदिवासियों को अपनी चिंता करने की जरूरत नहीं है। उनकी चिंता हजारों-लाखों पढ़े-लिखे, समझदार लोग कर रहे हैं। बाहर से देखने पर लग सकता है कि पढ़ा-लिखा तबका आदिवासियों के दुख-दर्दों को समझना चाहता है, उनमें साझीदार होना चाहता है। लेकिन जैसे ही हम आदिवासी समाज, राजनीति या साहित्य की दुनिया में प्रवेश करते हैं, बड़ी निराशा हाथ लगती है। साहित्य की दुनिया में हो रहे आदिवासी विषयक शोधों की स्थिति यह है कि शोधार्थियों का न तो आदिवासी जीवन से कोई परिचय है और न आदिवासी विषयक समाजशास्त्रीय और नृतत्व शास्त्रीय सिद्धांतों का अध्ययन।
  • Author: Madhav Hada

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 14-17, DOI:

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    उपनिवेशकालीन दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी विद्रोह पर एकाग्र हरिराम मीणा की रचना धूणी तपे तीर को यों तो उपन्यास की संज्ञा दी गई है, लेकिन यह इतिहास और दस्तावेज भी है। गल्प के अनुशासन में होने के कारण यह एक औपन्यासिक रचना है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज होने के कारण इसका साहित्येत्तर महत्त्व भी बहुत है। यह रचना हिंदी में साहित्य की साहित्येत्तर अनुशासनों के साथ बढ़ रही निकटता की भी साक्ष्य है।
  • Author: Sunil Kumar Dwivedi

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 18-30, DOI:

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    हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी एक कविता में एक जगह लिखा है - एक अकेली लड़की को घने जंगल जाते हुए डर नहीं लगता बाघ-शेर से डर नहीं लगता पर महुआ लेकर गीदम के बाजार जाने से डर लगता है। यह बड़े ही विषाद का विषय है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों के पश्चात भी हमारे देश की आधी आबादी आज भी असुरक्षा की भावना से भरी हुई है। कुछ-कुछ ऐसा ही हम सुन पाते हैं निर्मला पुतुल के ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ को - ‘‘अगर नहीं ! तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे एक स्त्री के बारे में--- ?’’
  • Author: Surendra Kataria

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 31-39, DOI:

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    भारतीय सन्दर्भों में अनुसूचित जनजातियाँ वे होती हैं जिन्हें संविधान के अनुच्छेद-342 के अन्तर्गत राष्ट्रपति, सम्बन्धित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करके अधिसूचित करते हैं। जहाँ तक आदिवासी, वनवासी या आदिम जनजाति जैसी शब्दावलियों के प्रचलन का प्रश्न है, ये दुनिया भर के उन समुदायों हेतु प्रयुक्त होती हैं जो वृहत् समाज की मुख्यधारा से अलग सुदूर वनीय एवं पर्वतीय क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परम्पराओं एवं रूढि़यों के साथ निवास करते हैं। आज, वैश्वीकृत, अर्थव्यवस्थाओं तथा सूचना प्रौद्योगिकी से प्रभावित ‘प्रबंध विज्ञान’ में ‘ट्राइब’ शब्द का दायरा विस्तृत हो गया है। ‘ट्राइब्स’ नामक पुस्तक के लेखक सेठ गोडिन की दृष्टि में ट्राइब ऐसे छोटे या बड़े समूह को कहते हैं जो एक नेता तथा एक विचार से जुड़े रहते हैं। सदियों से मानव धार्मिक, नृजातीय, आर्थिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक आधार पर ट्राइब में विकसित होता रहा है। इसी क्रम में निगमित सैक्टर ‘कॉरपोरेट सैक्टर’ में ट्राइब, समान विचारधारा या समान लक्ष्य वाले लोगों का समूह कहलाता है। प्रबंध के क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से ‘ट्राइबल लीडरशिप’ अवधारणा भी विकसित हो गई है जो मुख्यतः परंपरागत आदिवासी समुदायों की संस्कृति एवं जीवनशैली से प्रेरित है। यह सब प्रमुख रूप से सजातीयता तथा सहकारिता की भावना से संबद्ध है।
  • Author: Harish Kumar Sharma

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 40-49, DOI:

    Samvet

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    भारत की पूर्वोत्तर दिशा में गर्व से सीना ताने खड़ा है अरुणाचल प्रदेश! पूर्वोत्तर के सभी भारतीय राज्यों में अरुणाचल की स्थिति विशेष महत्त्व की है, क्योंकि यह तीन तरफ से चीन, म्यांमार और भूटान के साथ भारत की लम्बी सीमा-रेखा खींचता है। चीन के साथ 1030 किमी-, म्यांमार के साथ 440 किमी- और भूटान के साथ 160 किमी- इसकी सीमा लगती है। भारत की तरफ से असम के साथ 716 किमी- और नागालैण्ड के साथ लगभग 50 किमी- सीमा इसकी मिलती है।
  • Author: Subhdra Rathore

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 50-57, DOI:

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    ‘आदिवासी’ अर्थात् वे मानुष जो स्थल विशेष के ‘आदि’ वासी हैं, मूल अथवा प्रारंभिक। उनकी दूसरी परिभाषा यों की जा सकती है कि ‘‘आदिवासी अर्थात् ऐसे मनुष्य जो आज भी, विकसित हो चुकी मानव-सभ्यता से अलग-थलग, सुदूर वन प्रांतर में वास करते हैं।’’ उनके रहन-सहन में आदिम सभ्यता के लक्षण विद्यमान हैं। उनमें संग्रहण की प्रवृत्ति नहीं है, अपने लिए धन-धान्य एकत्रित कर लेने की सूझ या दृष्टि उनके भीतर शून्य है। जीवन निर्वाह की शर्तों में सिर्फ ‘जल-जंगल-जमीन’ हैं। ठेठ प्रकृति के अंचल में, प्रकृति प्रदत्त खाद्य और वनोपज से फक्कड़ जीवन जी लेने की कला का नाम है आदिवासी। वैश्वीकरण के अत्याधुनिक दौर में मानव ने अंतरिक्ष तक छलांग ली है, विकास के अनथक कदम बड़ी तेजी से लक्ष्य की ओर भाग रहे हैं किंतु दूसरी ओर अभी भी धरती के कई हिस्से कबीलों और आदिवासियों से भरे पड़े हैं, उन तक चौंध की एक कनी तक नहीं पहुँची। वे पसरे रेगिस्तानों, बीहड़ो या भयावह जंगलों में प्राकृतिक जीवन जी रहे हैं, अभावग्रस्त, सुख-सुविधा-साधन से पूरी तरह पृथक। हमारा देश भारत प्रकृति की अनुपम छटा से ओत प्रोत है, यहाँ भी आदिवासियों की अच्छी खासी बसाहट है। छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है और बस्तर मूलतः आदिवासियों की भूमि। बस्तर का क्षेत्रफल केरल राज्य से भी बड़ा हैं। यहाँ की धरती सम्पन्न है। इंद्रावती, गोदावरी जैसी बड़ी नदियाँ इसके भू-भागों को भिगोती हैं, वृहद पर्वत श्रेणियाँ हैं, गहन जंगल हैं, उन्नत किस्म के वनोपज हैं, बहुमूल्य खनिज हैं, संपूर्ण एशिया में (चौड़ाई के आधार पर) द्वितीय स्थान रखने वाला भारतीय नियाग्रा ‘चित्रकोट’ है, और रहस्यों से भरा ‘अबूझमाड़’ भी है। ‘अबूझमाड़’ अर्थात् समझ में न आ सकने वाला पहाड़। अबूझमाड़ बस्तर का आंतरिक हिस्सा है। स्वतंत्रता के पश्चात् आदिम संस्कृति के संरक्षण की दुहाई देकर जिसे आधुनिकता से दूर रखने की चेष्टा की गई। देशी-विदेशी पत्रकारों, पर्यटकों के लिए ठीक अंडमान-निकोबार के ‘जारवा’ आदिवासी की भाँति बस्तरिया आदिवासी का मांसल सौन्दर्य आकर्षण का केन्द्र रहा। जंगल सफारी की तर्ज पर ‘ट्रायवल-टूरिज्म’। प्रतिष्ठित पत्रिका में छपी नग्न तस्वीर पर तत्कालीन विधायक मनकूराम सोढ़ी ने विरोध दर्ज कराया, तब उनकी सुरक्षा के लिए यह क्षेत्र बाहरी लोगों के लिए बंद कर दिया गया। परिणाम और भयावह हुए, जंगल नगरों से और दूर हुआ।
  • Author: Akhilesh Kumar Shankhdhar

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 58-62, DOI:

    Samvet

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    ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ रणेंद्र का झारखंड के आदिवासी समुदाय ‘असुर’ को केंद्र में रखते हुए रचा गया पहला उपन्यास है। उनकी यह पहली औपन्यासिक कृति जहाँ एक तरफ असुर जनजाति की व्यथा-कथा को पूरी संवेदनशीलता एवं गहराई के साथ उजागर करती है, वहीं दूसरी ओर इस जनजाति के संदर्भ में समाज में व्याप्त परंपरित छवि को भी तोड़ती है। यहाँ यह उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा कि असुर जनजाति को ही इस बात का श्रेय दिया जाता है कि इसने ही आग और धातु की खोज की, और न केवल खोज की वरन् धातु पिघला कर उसे आकार देने वाली कारीगर जाति भी यही है। रणेंद्र मूलतः एक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं और एक जिज्ञासु शोधार्थी की भाँति उन्होंने इस समुदाय का समाजशास्त्रीय एवं सांस्कृतिक अध्ययन किया है जिसकी फलश्रुति है, उनका यह उपन्यास ग्लोबल गाँव के देवता। झारखंड इन्साइक्लोपीडिया (चार खंड) के संपादक के रूप में भी रणेंद्र ने अपने खोजकर्ता के स्वरूप को प्रदर्शित किया है। कहना यह है कि ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ कल्पना के स्थान पर यथार्थ तथा मिथक के स्थान पर सत्य को स्वर देता है। इधर बीच इस अवधारणा को बल मिला है कि साहित्य वस्तुतः सामाजिक दस्तावेज है। ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ उपन्यास का महत्त्व इस दृष्टि से भी बढ़ जाता है कि उपन्यासकार ने पूरी प्रामाणिकता के साथ असुर जनजाति के सामाजिक, सांस्कृतिक वैशिष्ट्य को अपने इस उपन्यास में चित्रित किया है। इस उपन्यास के विषय में प्रतिष्ठित मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पाण्डेय के इस कथन से सहमति जताई जा सकती है कि ’’आदिवासी समुदायों पर उपन्यास लिखते समय उपन्यासकार का एक काम आदिवासियों के जीवन के यथार्थ को समग्रता के साथ समझना है तो दूसरा काम उनके बारे में प्रचलित और प्रचारित मिथकों के प्रभाव से मुक्त होकर आदिवासियों के जीवन के इतिहास को व्यक्त करना है ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ के लेखक रणेंद्र ने ये दोनों काम किये है।’’
  • Author: Anshita Shukla

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 63-68, DOI:

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    ‘‘दरिद्रता का आलम ओढ़े, थारूओं और धाँगड़ों के गाँव! जहाँ-तहाँ पेड़ और झाडि़याँ, शेष सूखे की मार से कराहती धरती। उस पहली बरखा से आशा के जो बिरवे पनपे थे, फिर से कुम्हलाने लगे थे। इस धरती पर भी कब्जा किसका है? जबाव की तरह खड़ी थी गाँव के बीच चंद्रदीप सिंह की हवेलीनुमा बखरी।’’ इस कथन में चित्रित आदिवासियों की दशा में आज भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। जिस प्रकार भारत के अलग-अलग क्षेत्रें में आदिवासी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जो लड़ाई लड़ रहे हैं उससे यही प्रश्न फिर से खड़ा होता है कि वास्तव में धरती पर किसका कब्जा है ? भूमि सुधार, सामाजिक न्याय, प्रशासन के ढीले-ढाले रुख के कारण आज आदिवासियों के अस्तित्व को लेकर अनेक संकट उत्पन्न हो गए हैं। ‘झारखंड’ के ‘बिरहोर’, ‘शबर’, ‘कोरबा’, ‘असुर’ या ‘राजस्थान’ के ‘सहरिया’ आदिवासी जनजातियों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। भूमण्डलीकरण के बढ़ते दौर में उन्हें उनके क्षेत्रें से लगातार विस्थापित करने का प्रयत्न किया जा रहा है। विकास के नाम पर उनसे उनकी जमीनें छीनी जा रही है। गाँव के जमींदार के साथ-साथ देशी-विदेशी कंपनियाँ भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
  • Author: Dattatray Murumkar

    Volume: 2 (2)

    Year: 2014

    Pages: 69-74, DOI:

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    अस्मितामूलक विमर्श के दौर में स्त्री, दलित एवं आदिवासी साहित्य के केंद्र में आए हैं। हजारों सालों से जिन्हें उबरने नहीं दिया गया वे खुलकर अपनी अस्मिता को, अस्तित्व को, साहित्य के जरिए खोज रहे हैं। अपनी परंपरा की तलाश में निकला यह दमित, पीडि़त वर्ग, नयी चेतना, जिसे हम आंबेडकरी चेतना दृष्टि कहते हैं, से संपन्न है। कितने वर्षों से जिन्हें दबाया गया, सताया गया, बोलने, सोचने नहीं दिया गया जिन्हें गाँव के बाहर, या जंगलों में खदेड़ा गया, बर्बरतापूर्वक जिन्हें छला गया वे आदिवासी आज मिथकों में जिंदा हैं, लोकगाथाओं में जीते हैं। ब्रिटिश शासन जिन्हें गुनहगार मानता रहा, नागरी सभ्यता भी उन्हें नकारती रही है। आधुनिक सभ्यता के कोई लक्षण उनमें हम देखते नहीं। फिर भी समाजशास्त्रियों ने उनके विवाह, प्रेम, समाज, मातृत्व परंपरा की जी-भरकर प्रशंसा की है। प्राकृतिक साधनों पर जीवित प्रकृति के परिवेश से जुड़ा यह समाज लम्बे अरसे तक आधुनिकता से वंचित रहा।
  • Author: Pukhraj

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    Pages: 75-79, DOI:

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    स्ंसार के समस्त देशों में आदिवासी निवास करते हैं। आदिवासी से अभिप्राय देश के प्राचीनतम निवासियों है जो कि उन्नति के पथ की ओर अग्रसर नहीं हो पाए और देश की मुख्य धारा से कट गए एवं कालांतर में पिछड़ते ही गए। इन्हें अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। पाश्चात्य देशों में इन्हें ‘जिप्सी’ कहा जाता है, वहीं विकासशील देशों में इन्हें जनजाति, आदिवासी या अन्य समकक्ष नामों से पुकारा जाता है। इन आदिवासियों की संस्कृति से हमें उस देश की मूल प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के दर्शन होते हैं, जो आज मृतप्राय हो गई है। इस प्रकार आदिवासी समूहों की अपने देश में विशिष्ट पहचान, संस्कृति व सामाजिक व्यवस्था है। परन्तु विकास की मुख्य धारा से कटे होने के कारण ये अल्पविकसित रह गए और आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं हो पाए। आज भी पाश्चात्य देशों, अफ्रीका एवं अन्य देशों में आदिवासियों की आर्थिक स्थिति शोचनीय है।
  • Author: Vinod Kumar Vishwkarma

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    Pages: 80-89, DOI:

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    समकालीन विविध विमर्शीय चिन्तन एवं उत्तर आधुनिक दौर ने समाज के निचले स्तर को उठने और बोलने की आजादी प्रदान की इसलिए वर्तमान समय की यह जरुरत है कि आदिवासी समाज अपनी संस्कृति, अपनी अस्मिता एवं जीवन सत्य को पहचान कर आगे आए और समय से भिड़ कर अपने अधिकार और जीवन को समेकित कर अपना विकास करें। इस कविता में देखिए - ‘अपने ही घर में अपमानित - पीडि़त - शोषित शिक्षा और मौलिक अधिकार से विहीन अपनी पहचान छुपाए सशंकित और अभिशप्त जीवन जी रहे हम अपनी संस्कृति अपनी भाषा और अपने व्यवहार के लिए पीडि़त अस्मिता विहीन आखिर कब तक ? देश की आजादी का इस देश का हमारे लिए कुछ मतलब है क्या ? अपने ही संसाधनो से विहीन किए जाते राक्षस - अमानुस - असभ्य - असंस्कृत जैसे शब्दों से सम्मानित अधिकार की माँग पर नक्सली और सभ्यता एवं संस्कृति के नाम पर हमारी नुमाइश आखिर कब तक? अब हम अपमान की गुलामी की परम्परा को तोड़ना चाहते हैं चाहते हैं अपने ही घर में प्यार का, सम्मान का दृष्टिकोण चाहते हैं सम्मान की जिन्दगी इसलिए कि हमारे घर परिवार हमारे बच्चे भी हमारी भाषा और हमारी संस्कृति भी अपमान की पुरानी भाषा तोड़ते हैं और अपना समृद्ध इतिहास गढ़ना चाहते हैं इस देश के लिए हमने भी दिया है अपना बलिदान अब हमें और दर किनार नहीं किया जा सकता।
  • Author: Poonam Dave

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    Pages: 90-94, DOI:

    Samvet

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    संत मावजी वाग्वर अंचल के प्रमुख संतों में अग्रगण्य हैं। कहते हैं संत मावजी स्वयं पढ़े लिखे नहीं थे। किन्तु समाज को उन्होंने एक नवीन दृष्टि से युक्त करने के अपने भरसक प्रयास किए। उनके प्रयासों के माध्यम से आज डुँगरपुर-बाँसवाड़ा (वाग्वर अंचल) विश्व पटल पर नई पहचान बनाने में सफल हो रहा है। इसका उल्लेख साहित्य शोधों में इस प्रकार मिलता है -
  • Author: Prabha Pant

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    Pages: 101-111, DOI:

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    प्राकृतिक संपदा तथा सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पन्न उत्तराखण्ड राज्य में अनेक जातियाँ एवं जनजातियाँ निवास करती हैं। उत्तराखण्ड कुमाऊँ एवं गढ़वाल दो मंडलों में विभक्त है। ‘‘उत्तराखण्ड पश्चिमी नेपाल व हिमालय प्रदेश के बीच का पहाड़ी भू भाग है। जल प्रवाह की दृष्टि से यह काली तथा टौन्स नदियों के बीच का विस्तार है। पिथौरागढ़, चमोली तथा उत्तरकाशी जिले उच्च हिमालय में तिब्बत से सीमा बनाते है। परिवेश, परिस्थिति एवं वैचारिक भिन्नता के कारण एक ओर तो यहाँ सांस्कृतिक वैविध्य के दर्शन होते हैं, दूसरी ओर सांस्कृतिक एकरूपता भी दिखाई देती हैं, जो उत्तराखण्ड की संस्कृति को और भी अधिक भव्यता एवं विशिष्टता प्रदान करती है। अपनी सांस्कृतिक विविधता, तथा पारम्परिक विशिष्टता के कारण यहाँ का समाज आज भी अपनी अस्मिता बनाए हुए है, जिसे अक्षुण्ण बनाए रखने में यहाँ की जनजातियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। एक जनजाति, विकास के आदिम अथवा बर्बर आचरण में लोगों का एक समूह है, जो एक मुखिया की सत्ता स्वीकारते हों, तथा साधारणतया अपना एक समान पूर्वज मानते हों।
  • Author: Ravi Shankar Shukla

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    Pages: 112-123, DOI:

    Samvet

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    संजीव एक कथाकार के रूप में इस पीढ़ी के प्रतिनिधि लेखक हैं। उपन्यासकार के रूप में उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत ‘किशनगढ़ के अहेरी’ (1981) से की थी। फिर ‘सर्कस’ (1984) से लेकर ‘रह गयीं दिशाएँ इसी पार’ (2013) तक उन्होंने बहुत सजगतापूर्वक एक ऐसे लेखक की छवि गढ़ी है जो अपनी अन्तर्वस्तु में दोहराव से बचता है और अपने उपन्यासों के लिए गहन शोध करके अपने लेखन में प्रविष्ट होता हैं। बिहार-बंगाल के कोलियरी क्षेत्र में संजीव ने विशेष कार्य किये हैं। यहीं की कोयला खदानों के मजदूरों को केन्द्र में रखकर एक उपन्यास ‘सावधान! नीचे आग है- (1986) का उन्होंने सृजन किया। इससे ही कथाकार संजीव की छवि संघर्ष करते हुए समुदाय का पक्ष लेने वाले लेखक की बन गई। इसी विषय पर उन्होंने ‘धार’ (1990), ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’ (2000) जैसे उपन्यास लिखे।
  • Author: Sanju Shrimali

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    Pages: 124-130, DOI:

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    कभी नहीं माँगी बालिश्त भर जगह नहीं माँगा आधा राज भी माँगा है सिर्फ न्याय, जीने का हक थोड़ा सा पीने का पानी। ओम प्रकाश वाल्मीकि संजीवनी बूटी की खोज मानव का स्वभाव है। भारत में अनेक आदिवासी जातियाँ-प्रजातियाँ निवास करती हैं। आदिवासी समाज के जीवन को समृद्ध किए बिना देश के सामाजिक न्याय के साथ विकास की कल्पना निरर्थक होगी। आदिवासी जातियों के अध्ययन से यह निष्कर्ष सामने आता है कि भिन्न न्यादर्श जातियों में भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विषमताएँ विद्यमान हैं। आदिवासी समाज की विषमताओं के मूल में आर्थिक तत्त्वों की अहम भूमिका है या गैर आर्थिक घटक जिसमें कार्य नैतिकता, विश्वास, संस्कृतीकरण की तीव्रता राजनैतिक जागरूकता तथा शिक्षा के प्रसार के फलस्वरूप वे आत्मस्फूर्त हो सकी हैं।
  • Author: Mannalal Rawat

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    Pages: 131-136, DOI:

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    स्वतंत्र भारत आर्थिक रूप से लूटा हुआ और सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ था। देश का संविधान लागू होने के समय शैक्षणिक रूप से अति पिछड़े समूहों में आदिवासी समुदाय प्रमुख थे। वे सुदूर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में निवास करते हैं। सरकार ने इस उद्देश्य के लिए इन समूहों के लिए विशेष प्रावधान किये। इस उद्देश्य को संविधान के मूलाधिकार तथा राज्य की नीति निदेशक तत्त्वों के प्रावधान समर्थन देते थे। शासन की शिक्षा नीति में इस समुदायों को आगे लाने के लिए कई प्रावधान किये गये। स्वतंत्रता के उपरान्त समय-समय पर बनाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इन समुदायों के लिए बनाए गये प्रमुख दिशा-निर्देशों का विवरण यहाँ दिया जा रहा है।
  • Author: Rajni P. Rawat

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    Pages: 137-141, DOI:

    Samvet

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    वन जनजातियों के लिए हजारों वर्षों से आश्रयस्थल रहे हैं। डॉ. बी.डी. शर्मा के अनुसार वनों के बगैर आदिवासी जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। धरती उनके लिए माता समान है। वे प्राकृतिक जीवन जीते रहे हैं। वे सदियों से जंगल के राजा रहे थे। भारत में सरकार ने सन् 1865 में भारतीय वन कानून बनाकर मानव-वन सम्बन्धों को नयी परिभाषा दे दी। स्वतन्त्रता पश्चात् देश में पूर्व निर्मित राष्ट्रीय वन नीति में कई संशोधन किए गये परन्तु ये संशोधन सन् 1894 ई. के वन अधिनियम पर ही निर्मित थे। वन नीति में विभिन्न आवश्यक अधिकारों को प्रतिपादित किया गया। अब स्थानीय आवश्यकताओं तथा मूल निवासियों के प्रश्नों का इस नीति में स्थान रहा चाहे वे स्वीकार्य रूप में हो या उपेक्षित रूप में। स्वतंत्र भारत में वन नीति को हम निम्न चरणों में समझ सकते हैं
  • Author: Kesrimal Ninama

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    Pages: 142-147, DOI:

    Samvet

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    अनेकता में एकता भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। भारतीय संस्कृति की तरह जनजातीय संस्कृति भी अपनी विशिष्टताओं से परिपूर्ण है। जो जनमानस में प्रवहमान सरिता के रूप में विद्यमान है। यह उनकी अपनी अस्मिता की पहचान को बनाए रखने का सशक्त माध्यम है। जनजाति का इतिहास गौरवशाली है जिसमें कई महापुरुष जैसे- महर्षि वाल्मीकि, महान तपस्वी माता शबरी, गुरुभक्त धनुर्विद्या विशारद वीर एकलव्य, विश्वज्ञाता शंबुक, क्रान्तिकारी बिरसा मुण्डा, तात्या भील, वीर सेना नायक राणा पूंजा भील, न केवल ये महापुरुष वरन काली बाई भीलबाला के साथ न जाने कितने भील महान वीर देशभक्त व योद्धा हुए हैं जिन्होंने भीली संस्कृति के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। यही नहीं मेवाड़ जैसे महान रियासतकालीन महाराणाओं का राज्याभिषेक भील सरदार अपने हाथ के अंगूठे के खून से करते थे। वो देशभक्ति की इस नायाब परम्परा का पालन कितनी बखूबी से निभाते थे, ये इन्हीं उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है।