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Rivista is an international multidisciplinary and multilingual open access, blind peer-reviewed quarterly and fully refereed journal.

ISSN Online:   2529-7953

DOI :   10.26476/rivista

Website: http://www.inscribepublications.com/journal/rivista

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  • Author: Archana Jain; Manoj Rajguru

    Volume: 1, No. 1

    Year: 2017

    Pages: 1-24, DOI: 10.26476/rivista.2017.01.01-24

    RIVISTA

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    मनुष्य हर युग में सामाजिक प्राणी होते हुए भी कई बार समाज विरोधी कार्य भी करता है। इन कार्यों की गणना अपराध के रुप में होती है। इसी कारण समाज ने अपने प्रत्येक सदस्य की सर्वविध सुरक्षा एवं उनके हितार्थ विविध नियम एवं उपनियम बनाए है। जिन्हें संतान्य भाषा में कानून अथवा विधि कहते हैं। इन्हीं से समाज में सर्वथा सुख-शान्ति, सुव्यवस्था बनाने का प्रयास किया जाता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अपराध की अवधारणा एक समाज से दूसरे समाज में तथा एक युग से दूसरे युग में परिवर्तित होती रही है। इसी अनुरुप दण्ड व्यवस्था में भी बदलाव दृष्टिगोचर होता है। किसी भी समाज और संस्कृति के इतिहास का वर्तमान और भविष्य से गहरा सम्बन्ध होता है। इसी संदर्भ में प्राचीन भारतीय समाज में अपराध के संदर्भ में प्रयुक्त दण्ड व्यवस्था जो प्राचीन साहित्यों में उल्लेखित हैं। यदि तत्कालीन व्यवस्था के अनुरूप प्रावधान वर्तमान में भी अपनाये जाए तो संस्कृति की रक्षा संभव है और समाज में अपराधों की रोकथाम के लिए प्राचीन अनुभवों का लाभ भी लिया जा सकता है। किंतु यह भी जरुरी नहीं कि दण्ड़ संबंधित प्राचीन विधान और प्रावधान वर्तमान में उपयोगी हो। इसी दृष्टि से प्रस्तुत आलेख में प्राचीन साहित्य में उल्लेखित दण्ड व्यवस्था के साथ वर्तमान दण्ड व्यवस्था के तुलनात्मक संदर्भों का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है। आलेख अपराध और दण्ड की सैद्धांतिकी के साथ ही, प्राचीन और आधुनिक काल में प्रचलित दण्ड व्यवस्था पर प्रकाश डालता है और अंततः प्राचीन दण्ड व्यवस्था की वर्तमानकालिक प्रांसगिकता को रेखांकित करता है।
  • Author: Mukesh Kumar Sharma

    Volume: 1, No. 1

    Year: 2017

    Pages: 25-34, DOI: 10.26476/rivista.2017.01.25-34

    RIVISTA

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    नंदकिशोर आचार्य का लेखन कर्म प्रारंभ से ही भाषिक प्रयोग में निरंतर प्रयोगधर्मी रहा है। भाषा प्रारम्भ से ही इनके आकर्षण का विषय रही है। श्रीआचार्य भारतीय मूल्यों के प्रति विश्वास रखते हुए भी उनमें युगीन परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन करने के पक्षधर रहे हैं। साहित्य में भारतीय मूल्यों के साथ–साथ तकनिकी विकास के अनुरूप मनुष्यों के आगे बढ़ने से ही मानवीय मूल्यों की स्थापना की जा सकती है। लोकतंत्र की आधारभूमि (मूल शक्ति) प्रत्येक मनुष्य के स्वत्वाधिकारों की रक्षा करना है। भाषा मनुष्यों को तोड़ती नहीं जोड़ती है इसी धारणा के आधार पर वह अपने सरोकारों को पूर्ण कर पाती है। नई सदी की काव्य कृतियों को आधार बनाकर आचार्य के भाषिक और साहित्यिक वैशिष्ट्य को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है जिसमें –मुक्तक छंद, शाब्दिक-विधान में नवीन प्रयोग, उर्दू के शेरों व महाभारत के श्लोक एवं कविता को संदर्भ में दे कर कविता लेखन –‘हाज़िर जवाबी शैली में’, परसर्गों का शब्दों से अलग प्रयोग, प्रयोगधर्मिता, ईश्वर संबंधी धारणाओं को भारतीय अद्वेत दर्शन और अस्तित्ववादी दर्शन से भी प्रस्तुत करने का कार्य किया गया है। समकालीन कविता कहती कम और संकेत अधिक करती है इसे इनकी कविताओं में प्रतिफलित होता हुआ अनुभूत किया जा सकता है जो एक साथ एक से अधिक भावों और अनुभूतियों को संवेदना के धरातल पर साकार करती हैं। इनका काव्य भारतीय जीवन मूल्यों से जुड़कर निरंतर सामाजिक और साहित्यिक मूल्यों को आगे बढ़ा रहा है। संवेदनाओं का सूक्ष्मांकन इनकी कविताओं में विभिन्न दार्शनिक, ऐतिहासिक, वैयक्तिक एवं मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमियों में सांगोपांग रूप में वर्णित हुआ है।
  • Author: Vivek Mandot

    Volume: 1, No. 1

    Year: 2017

    Pages: 35-40, DOI: 10.26476/rivista.2017.01.35-40

    RIVISTA

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    वैश्वीकरण ने हर घर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की शुरुआत की है और ई-अपशिष्ट को अब पूरी दुनिया में पर्यावरण के लिए खतरा माना जाता है। वर्तमान अध्ययन, राजस्थान राज्य में डुंगरपुर के आदिवासी क्षेत्रों के गांवों में सर्वेक्षण विधि से यादृच्छिक नमूना तकनीक का उपयोग करके किया गया। विश्लेषण से पता चलता है कि ई-अपशिष्ट के खतरे के बारे में जागरूकता का स्तर बहुत कम है। मोबाइल, टेलीविज़न और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल करने वाले लोगों का एक महत्वपूर्ण प्रतिशत उन्हें बेबुनियाद छोड़ने के हानिकारक प्रभावों से अवगत नहीं हैं। सर्वे में 20 प्रश्नावली और पियर्सन विश्वसनीयता गुणांक 0.89 पाया गया । विश्लेषण के अनुसार आय के आधार पर बराबर विचरण के 0.05 स्तर पर शून्य परिकल्पना निरस्त हो जाती है और असमान विचरण के लिए 0.01 स्तर पर परीक्षण को अस्वीकार करते हैं जबकि लिंग और आयु के आधार पर शून्य परिकल्पना के अनुसार ई-अपशिष्ट के दुष्परिणामों की जानकारी में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया।
  • Author: Hussaini Bohra

    Volume: 1, No. 1

    Year: 2017

    Pages: 41-50, DOI: 10.26476/rivista.2017.01.41-50

    RIVISTA

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    मनोविज्ञान सामान्य स्वस्थ व्यक्ति का अध्ययन करता है, वह केवल शारीरिक अध्ययन न करके मनुष्य के आन्तरिक भावों, विचारों के द्वन्द्व आदि का अध्ययन करता है। आधुनिक युग में मनोविज्ञान की उपादेयता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। मनोविज्ञान आज के उपन्यास के लिए अत्यावश्यक तत्त्व हो गया है। उपन्यास में कई ऐसे मनोवैज्ञानिक तत्त्वों का सहज समावेश हो गया है कि हम उनको मनोविज्ञान से पृथक् नहीं कर सकते। उपन्यास एक ऐसी विधा है जो कि जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिए वृहत्तर फलक प्रस्तुत करता है। मानव जीवन के सभी रहस्यों को पूर्णता के साथ प्रस्तुत करता है। आज की महिलाओं का उपन्यास लेखन जिस मुकाम पर है, वह गुणवत्ता और परिणाम दोनों ही दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। हिन्दी कथा यात्रा में उषा प्रियंवदा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपने उपन्यासों में महानगरीय जीवन के संत्रास और आधुनिक जीवन शैली से उत्पन्न समस्याओं को अपनी पैनी नजर से देखा-परखा है। उनके कथा साहित्य में स्त्री की मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं को पूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान की गई है। उषा प्रियंवदा ने मूल रूप से भारतीय एवं पढ़ी-लिखी महिलाओं की समाज में स्थिति को रेखांकित करने का प्रयास किया है। कामकाजी अविवाहित स्त्री के सामाजिक परिवेश और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच जटिल अंतःसंबंधों की मनोवैज्ञानिक स्तर पर सूक्ष्म जांच-पड़ताल और सामाजिक स्तर पर बेहतर विकल्प की खोज में “पचपन खम्भे लाल दीवारें” उपन्यास संघर्ष की पहली महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। शादी के सवाल पर अपनी एक सहेली से सुषमा कहती है- आप भी क्या यही मानती हैं, कि विवाह होना चाहिए? मेरे पास तो सभी कुछ है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हूं, जो चाहूं कर सकने में समर्थ हूं। समग्रतः उषा प्रियंवदा के कथा साहित्य में मूलतः आधुनिक और शिक्षित नारियों के अन्तर्द्वंद्व को अभिव्यक्ति दी गयी है। नारियो की दोयम स्थति एवं अति महत्वकांशाओॱॱ ने मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित किया है।
  • Author: Vimal Kumar Saraswat

    Volume: 1, No. 1

    Year: 2017

    Pages: 51-56, DOI: 10.26476/rivista.2017.01.51-56

    RIVISTA

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    वायुमंडलीय विद्युतिकी को सभी ने आसमान में देखा है परन्तु इसके बारे में अभी अधिक जानकारी का अभाव है। यह किन कारणों से उत्पन्न होती है? इसका मान कितना होता है? क्या यह किसी कार्य में प्रयुक्त की जा सकती है, यदि हां तो कैसे? इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर यह शोध पत्र तैयार किया गया है तथा इसे जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए विशेष रूप से हिंदी में लिखा गया है, जिससे कि ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी इसका फायदा उठा सके । इस शोध पत्र में यह प्रयास किया गया है विषय की पृष्ठभूमि को जितना संभव हो उतना सरल भाषा में लिखा जाये जिससे इसे अधिकतम लोगों तक पहुँचाया जा सके । इसमें इस विषय पर प्रारंभ से लेकर अभी तक किये कार्यों का उल्लेख किया गया है ।

Aim and Scope

This journal covers all the topics of the universe i.e., a field of Science, Commerce, Management, Medical, Engineering, Nursing, Arts, Humanities, Social Sciences, Environment, Laws, and all other fields related to Global and Regional issues. This journal supports all the regional, national and international languages like Russian, Spanish, French, German, Hindi, Bengali, Urdu, Arabic, etc., The main objective of Rivista is to provide an intellectual platform for the international scholars and to promote interdisciplinary studies in the society in their well-known regional language.

        Editor-in-Chief

Dr. Vimal Kumar Saraswat, Bhupal Nobles’ University, India

Editorial Board

Dr. Mirzi L. Betasolo, The Papua New Guinea University of Technology, Papua New Guinea

Dr. Poonam Dhaka, University of Namibia, Namibia

Dr. Hitendra Singh Rathore, Banasthali Vidhypith University, India

Dr. Manoj Kumar Singh Chhangani, Government Meera Girls’ College, India

Mr. Deepankar Goyal, Takeda Pharmaceutical, U.S.A.

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